हालांकि, अदालत ने मानवीय पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सबसे पहले उन परिवारों की पहचान की जाए, जो संभावित विस्थापन से प्रभावित होंगे। यदि उन्हें हटाया जाता है, तो रेलवे और राज्य सरकार मिलकर पात्र परिवारों को छह महीने तक प्रति माह दो हजार रुपये की आर्थिक सहायता देंगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई अप्रैल में होगी और तब तक अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। लेकिन यह राहत उत्तराखंड के अन्य अवैध कब्जों पर लागू नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने नैनीताल जिला प्रशासन, राजस्व अधिकारियों और रेलवे को संयुक्त रूप से विशेष कैंप लगाने के निर्देश दिए हैं, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के पात्र लोग प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत आवेदन कर सकें। ईद के बाद एक सप्ताह का विशेष कैंप लगाया जाएगा। जिलाधिकारी नैनीताल और एसडीएम हल्द्वानी को निर्देश दिया गया है कि वे लॉजिस्टिक सहायता सुनिश्चित करें, ताकि कोई भी पात्र परिवार आवेदन से वंचित न रहे। सामाजिक कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर योजना की जानकारी देने को कहा गया है। कोर्ट ने बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र स्थापित करने का भी निर्देश दिया है।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि हल्द्वानी रेलवे विस्तार का अंतिम बिंदु है। इसके आगे पहाड़ी क्षेत्र और नदी की भौगोलिक स्थिति के कारण ट्रैक विस्तार जटिल हो जाता है। ऐसे में यह भूमि रेलवे परियोजना के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार ने बताया कि कुछ भूखंड फ्रीहोल्ड हैं, जिन पर मुआवजा दिया जाएगा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने भरोसा दिलाया कि पात्र विस्थापितों को छह महीने तक भत्ता मिलेगा।
वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि करीब 50 हजार लोग दशकों से वहां रह रहे हैं और इतने बड़े पैमाने पर पुनर्वास आसान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे के पास आसपास खाली जमीन उपलब्ध है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह निर्णय कब्जाधारी नहीं कर सकते कि रेलवे किस जमीन का उपयोग करे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीन सरकार की है और अवैध कब्जा हटाया जाना चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि झुग्गियों में रहने वाले लोगों के प्रति सहानुभूति जरूरी है और हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन व बेहतर आवास का अधिकार है। मामला अब अप्रैल में फिर सुना जाएगा।